सुंघनी साहू १
महादेवी वर्मा को जयशंकर प्रसाद से मुलाक़ात के लिए किस तरह की कठिनाईयों का सामना करना पड़ा था? ‘सुंघनी साहू’ पाठ के आधार पर लिखिए।
महादेवी वर्मा को जयशंकर प्रसाद से मिलने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यह घटना तब की है जब महादेवी वर्मा भागलपुर से प्रयाग की यात्रा पर थीं और काशी में कुछ घंटों के लिए प्रसाद जी से मिलने के उद्देश्य से रुक गईं। काशी की सड़कों और गलियों से वे और उनके साथ आया नौकर, दोनों अपरिचित थे। कवि जयशंकर प्रसाद का पता पूछने पर उन्हें कोई सही जानकारी नहीं मिली।
जब उन्होंने कई ताँगेवालों से प्रसाद जी का पता पूछा, तो उनमें से एक ने "सुँघनी साहू" का नाम लिया। यह सुनकर महादेवी वर्मा हैरान हो गईं, क्योंकि "सुँघनी साहू" का अर्थ तंबाकू का व्यवसाय करने वाले व्यक्ति से लगाया जा सकता था। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा था कि एक महान कवि तंबाकू की दुकानदारी जैसा साधारण कार्य कैसे कर सकते हैं। ताँगेवाले ने जोर देकर कहा कि "सुँघनी साहू" बड़े कवित्त लिखते हैं। निराश होकर स्टेशन पर लौटने के बजाय, उन्होंने यह निश्चय किया कि "सुँघनी साहू" से ही प्रसाद का पता पूछ लें।
काशी की संकरी गलियों में ताँगे से और कुछ पैदल चलने के बाद, वे एक सफेद पुते हुए साधारण-से मकान के सामने पहुँचीं। महादेवी वर्मा ने अपने आगमन की सूचना दी। मकान के स्वामी स्वयं बाहर आए, और यह देख कर महादेवी वर्मा को आश्चर्य हुआ कि वे प्रसाद जी ही थे।
महादेवी वर्मा ने जब पहली बार प्रसाद जी को देखा, तो उनकी कल्पना में बसे स्थविर (हृष्ट-पुष्ट) कवि का चित्र टूट गया। प्रसाद जी मझोले कद के, छरहरे शरीर के व्यक्ति थे। उनके चेहरे पर सौम्यता, आँखों में चमक और होठों पर स्वाभाविक मुस्कान थी। उनकी सादगी ने महादेवी वर्मा को प्रभावित किया। इस पर महादेवी ने मुस्कुराते हुए चुटकी ली, ‘आप भी कहाँ प्रसाद लगते हैं, जो चित्र में बौद्ध भिक्षु जैसे हैं!" इस पर प्रसाद जी ने भी हँसते हुए कहा, "आप तो महादेवी जी नहीं जान पड़तीं।"
महादेवी वर्मा को प्रसाद जी का घर भी बेहद साधारण लगा। कमरे में एक तख्त, दो-तीन सादी कुर्सियाँ, अलमारी में कुछ पुस्तकें और दीवार पर दो-तीन चित्र थे। उनकी सजावट की साधारणता के विपरीत, उनके व्यक्तित्व और बातचीत में एक गहरी प्रभावशीलता थी।
प्रसाद जी उन दिनों अपनी महान काव्य रचना "कामायनी" के दूसरे सर्ग पर कार्य कर रहे थे। महादेवी वर्मा ने जब यह पूछा कि वे क्या लिख रहे हैं, तो उन्होंने "कामायनी" के प्रथम सर्ग का कुछ अंश पढ़कर सुनाया और फिर इस महाकाव्य के कथानक और दार्शनिक आधार की व्याख्या की। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने ऐसा कथानक क्यों चुना, जो दार्शनिक दृष्टि से अधिक संभावनाएँ प्रस्तुत कर सके। उनका मानना था कि प्राचीन कथाओं को दार्शनिक निष्कर्ष तक पहुँचाने के लिए लचीलापन होना चाहिए, जो "कामायनी" के कथानक में मौजूद था। इस दौरान, प्रसाद जी और महादेवी वर्मा के बीच भारतीय दर्शन, वैदिक साहित्य, और इतिहास पर गहन चर्चा हुई। महादेवी वर्मा ने अनुभव किया कि प्रसाद जी न केवल इन विषयों में बहुश्रुत थे, बल्कि उनकी अपनी विशिष्ट व्याख्या और दृष्टिकोण भी थी। वे कम शब्दों में गहरी बात कहने की अद्भुत क्षमता रखते थे।
जब महादेवी वर्मा ने विदा ली, तो प्रसाद जी उन्हें ताँगे तक छोड़ने आए और उनके दृष्टि से ओझल होने तक वहीं खड़े रहे। इस संक्षिप्त मुलाकात में महादेवी वर्मा को प्रसाद जी के व्यक्तित्व, उनकी सादगी और उनके विचारों की गहराई का अनुभव हुआ। यह उनकी पहली और अंतिम भेंट थी, लेकिन इस मुलाकात ने महादेवी वर्मा के मन पर एक अमिट छाप छोड़ी।
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